सब जन्मे एक बीज से
Sab janame janme ek bij beej se
सब जन्मे एक बीज से, सबकी मिट्टी एक है
मन में दुविधा पड़ गई, हो गए रूप अनेक
जो तू सच्चा बनिया, सब से एक सा बोल
ऊंच-नीच को छोड़ दे, एक बराबर तोल
ऊंचे कुल के कारण तू, दुनिया भूल रहा
जब तन मिट्टी हो जाएगा, तब कुल का होगा क्या?
कहत कबीर ना गर्व कर, ना किसी की हंसी उड़ा
अब तेरी भी नैया समुद्र में, जाने क्या हो जाए