बोल मजूरे हल्ला बोल
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हल्ला बोल भई हल्ला बोल भई हल्ला बोल भई हल्ला बोल
बोल मजूरे हल्ला बोल, बोल मजूरे हल्ला बोल
हल्ला बोल भई...
कांप उठी सरमायेदारी खुल के रहेगी इसकी पोल
बोल मजूरे हल्ला बोल...
खून को अपने बना पसीना, तूने बाग लगाया है
कुंए खोदे नहर निकाली, ऊंचा महल उठाया है
चट्टानों में फूल खिलाये, शहर बसाये जंगल में
अपने च़ौडे कंधों पर दुनिया को यहां तक लाया है
बांकी फौज कमेरों की है, तू है नहीं भ़ेडों की गोल
बोल मजूरे हल्ला बोल...
गोदामों में माल भरा है, नोट भरे हैं बोरों में
बेहोशों को होश नहीं है, नशा च़ढा है जोरों में
इसका दामन उसने फ़ाडा, उसका गिरेबां इसके हाथ
कफनखसोटों का झग़डा है, ह़ोड मची है चोरों में
ऐसे में आवाज उठा दे, ला मेरी मेहनत का मोल
बोल मजूरे हल्ला बोल...
सिहर उठेगी लहर नदी की, सुलग उठेगी फुलवारी
कांप उठेगी पत्ती-पत्ती, चटखेगी डारी-डारी
सरमायेदारों का पल में नशा हिरन हो जायेगा
आग लगेगी नन्दन वन में, दहक उठेगी हर क्यारी
सुन-सुन कर तेरे नारों को, धरती होगी डावांडोल
बोल मजूरे हल्ला बोल...
- कान्ति मोहन