इरादे कर बुलन्द
irade kara bulanda irade kara bulanda irAde kara bulanda | इरादे कर बुलन्द
इरादे कर बुलन्द अब रहना शुरु करती तो अच्छा था
तू सहना छोडकर कहना शुरु करती तो अच्छा था
सदा औरों को खुश रखना बहुत ही खूब है लेकिन
खुशी थ़ोडी तू अपने को भी दे पाती तो अच्छा था
दुखों को मान किस्मत, हार कर रोने से क्या होगा
तू आंसू पोंछ कर अब मुस्कुरा लेती तो अच्छा था
ये पीला रंग, लब सूखे, सदा चेहरे पे मायूसी
तू अपनी इक नई सूरत बना लेती तो अच्छा था
तेरी आखों में हैं आंसू, तेरे सीने में हैं शोले
तू इन शोलों में अपने गम जला लेती तो अच्छा था
है सर पर बोझ जुल्मों का, तेरी आंखें सदा नीची
कभी आंखें उठा तेवर दिखा देती तो अच्छा था
बनाये आशियां कितने, मगर बेघर अभी भी तू
कुर्बानी छोड कर घर अपना बना लेती तो अच्छा था
तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन
तू इस आंचल का इक परचम बना लेती तो अच्छा थाग्न
- कमला भसीन