तू खुद को बदल
tu khuda ko badala tu khuda ko badala tU khuda ko badala | तू खुद को बदल
दरिया की कसम मौजों की कसम
ये ताना बाना बदलेगा
तू खुद को बदल तू खुद को बदल
तब ही तो जमाना बदलेगा
तू चुप रह कर जो सहती रही
तो क्या ये जमाना बदला है
तू बोलेगी मुंह खोलेगी
तब ही तो जमाना बदलेगा
दस्तूर पुराने सदियों के
ये आये कहां से क्यों आये
कुछ तो सोचो कुछ तो समझो
ये क्यों तुमने हैं अपनाये
ये पर्दा तुम्हारा कैसा है
क्या ये मजहब का हिस्सा है
कैसा मजहब किसका पर्दा
ये सब मदारें का किस्सा है
आवाज उठा कदमों को मिला
रफ्तार जरा कुछ और ब़ढा
मशरिफ से उठो मगरिब से उठो
फिर सारा जमाना बदलेगा
(कव्वाली की धुन पर हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की महिलाओं व्दारा एक वर्कशॉप में रचित गी त)