दरबारे - वतन में जब इक दिन
darabare - vatana mem jaba ika dina darabare - vatana mem jaba ika dina darabAre - vatana meM jaba ika dina | दरबारे - वतन में जब इक दिन
दरबारे-वतन में जब इक दिन सब जाने वाले जायेंगे
कुछ अपनी सजा को पहुंचेंगे, कुछ अपनी जजा १ ले जायेंगे
ऐ µखाकनशीनों २ , उठ बैठो, वो वक्त करीब आ पहुंचा है
जब तµख्त गिराये जायेंगे, जब ताज उछाले जायेंगे
अब ट़ूट गिरेंगी जंजीरें, अब जिन्दानों ३ की खैर नहीं
जो दरिया झूम के उठ्ठ़े हैं, तिनकों से न टाले जायेंगे
ऐ जुल्म के मारों, लब खोलो, चुप रहने वालों चुप कब तक
कुछ हश्र ४ तो इनसे उठ्ठ़ेगा, कुछ दूर तो नालै ५ जायेंगे
कटते भी चलो, ब़ढते भी चलो, बाजू भी बहुत हैं सर भी बहुत
चलते भी चलो, कि अब डेरे मंजिल पे ही डाले जायेंगे
- फैज अहमद फैज
१.पारितोषिक २.धूल-मिट्टी में रहने वालों ३.जेल ४. शोर ५.आंर्तनाद